Friday, August 14, 2009

जीवन है उत्सव

एक खाली कनस्तर उठा,
दो सूखे डंडे तोड़
और बजा
धिन धा धिन धा धिन धा धा |

कभी किसी गाँव में जा
नदी के किनारे
टाई कोट उतार
और बिंदास छलांग लगा |

जीवन है उत्सव
न जाने दे एक पल भी व्यर्थ
तोड़ छद्म आडम्बर की बेडियाँ
हर लम्हे को भरपूर जीता जा |

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