Friday, August 14, 2009

सारी रात ( बादल सरकार को समर्पित)

सारी रात .....
सारी रात जगा हूँ मैं
अनिद्रित नेत्रों से अपलक
ताकता शून्य में
सारी रात .....

स्वप्नों के आडम्बर से भयभीत
अशक्त अधीर कुंठित मन से
प्रश्नों के इस छद्मजाल को
बुनता रहा
सारी रात ......

पीड़ा प्रहर्ष के संधि पात पर
प्रणय विरह के झंझावत को
स्मृतियों के तीव्र भंवर में
ख़ुद ही ख़ुद को
छलता रहा
सारी रात .......
सारी रात .......

No comments:

Post a Comment