आजकल आईना
जैसे मुझ में
मुझ ही की
पहचान ढूंढता है |
मेरे जर्रे जर्रे में
मेरा ही
निशान ढूंढता है |
कैसे समझाऊं इसे
वक़्त की नजाकत ,
ये दीवाना
तो
मेरे अक्स में
खुदी का
कोई पैगाम ढूंढता है |
Saturday, August 15, 2009
Friday, August 14, 2009
जीवन है उत्सव
एक खाली कनस्तर उठा,
दो सूखे डंडे तोड़
और बजा
धिन धा धिन धा धिन धा धा |
कभी किसी गाँव में जा
नदी के किनारे
टाई कोट उतार
और बिंदास छलांग लगा |
जीवन है उत्सव
न जाने दे एक पल भी व्यर्थ
तोड़ छद्म आडम्बर की बेडियाँ
हर लम्हे को भरपूर जीता जा |
दो सूखे डंडे तोड़
और बजा
धिन धा धिन धा धिन धा धा |
कभी किसी गाँव में जा
नदी के किनारे
टाई कोट उतार
और बिंदास छलांग लगा |
जीवन है उत्सव
न जाने दे एक पल भी व्यर्थ
तोड़ छद्म आडम्बर की बेडियाँ
हर लम्हे को भरपूर जीता जा |
सारी रात ( बादल सरकार को समर्पित)
सारी रात .....
सारी रात जगा हूँ मैं
अनिद्रित नेत्रों से अपलक
ताकता शून्य में
सारी रात .....
स्वप्नों के आडम्बर से भयभीत
अशक्त अधीर कुंठित मन से
प्रश्नों के इस छद्मजाल को
बुनता रहा
सारी रात ......
पीड़ा प्रहर्ष के संधि पात पर
प्रणय विरह के झंझावत को
स्मृतियों के तीव्र भंवर में
ख़ुद ही ख़ुद को
छलता रहा
सारी रात .......
सारी रात .......
सारी रात जगा हूँ मैं
अनिद्रित नेत्रों से अपलक
ताकता शून्य में
सारी रात .....
स्वप्नों के आडम्बर से भयभीत
अशक्त अधीर कुंठित मन से
प्रश्नों के इस छद्मजाल को
बुनता रहा
सारी रात ......
पीड़ा प्रहर्ष के संधि पात पर
प्रणय विरह के झंझावत को
स्मृतियों के तीव्र भंवर में
ख़ुद ही ख़ुद को
छलता रहा
सारी रात .......
सारी रात .......
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